Wednesday, December 1, 2010

रेत के महेल

सपने सजाते हैं लोग
दिल जाता है बहेल
बनाते हैं जाने क्यों लोग
रेत के महेल॥

हवा से बिखर सकता है
लहरों के आगोश में सिमट सकता है
फिर भी लोग बनाते हैं,
रेत के महेल॥

कुछ सींचते हैं मिटटी से, पत्थर से,
सपने उनके दूर तलक रहते हैं
नहीं कहलाते वो सिर्फ रेत के महेल॥

और कुछ युहीं छोड़ जाते हैं
सब बह जाता है
बचती है तो सिर्फ रेत,
नहीं बचते, वो रेत के महेल॥

1 comment:

  1. Nice! Something to do with mood? Or is it one of your old timers?

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