हाथ में कलम
पकडे
सियाही लिए,
खाली पन्ने को
ताक रहा हूँ।
पर जाने क्यों
शब्द कहीं
खो से गए हैं।
ख्वाब में जो
कहानिया बुनी
थी कयी
मानो ख्वाबों
की
दुनिया में लौट
गयी।
अधूरे से
ख्याल हैं बस
जो अपने होने
का एहसास भर सा लिए बैठे हैं।
क्या लिखने
बैठा था
जाने अब क्या
लिखा जायेगा।
मनन इस कशमकश
में है
क्या ख्वाब
मेरा
कहानी का रूप
ले पायेगा
या युहीं वो
बस
एक ख्याल बन्न
के रह जायेगा।
हाथ में कलम
पकडे
सियाही लिए,
खाली पन्ने को
ताक रहा हूँ।
कुछ शब्दों की
ज़रूरत है
बस उन्ही को
तलाश रहा हूँ।
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